अजय वर्मा, अश्वनी वर्मा
हरिद्वार। श्यामपुर स्थित श्री श्याम वैकुंठ धाम के परमाध्यक्ष प्रातः स्मरणीय गुरु भगवान श्री महंत श्री श्याम सुंदर महाराज जी महाराज ने ज्ञान की अनंत प्रेम वर्षा करते हुए कहाईश्वर की भक्ति केवल मन की शांति का साधन नहीं है बल्कि यह वह आध्यात्मिक सेतु है जो जीवात्मा को परमात्मा के अनंत स्वरूप से जोड़ता है और इस यात्रा में गुरु की भूमिका उस प्रकाश स्तंभ के समान होती है जो अज्ञान के सघन अंधकार में भटकते हुए पथिक को सही दिशा का बोध कराता है। भारतीय संस्कृति और दर्शन में भक्ति को हृदय का शुद्ध भाव माना गया है जिसमें समर्पण की पराकाष्ठा होती है और जब साधक पूर्ण विश्वास के साथ स्वयं को ईश्वर के चरणों में अर्पित कर देता है तो उसके जीवन के समस्त संशय स्वतः ही समाप्त होने लगते हैं परंतु इस समर्पण की राह में आने वाली माया की बाधाओं और सांसारिक प्रलोभनों से बचने के लिए एक ऐसे मार्गदर्शक की आवश्यकता होती है जिसने स्वयं उस सत्य का साक्षात्कार किया हो जिसे हम गुरु कहते हैं। गुरु वह तत्व है जो शिष्य की सुप्त चेतना को जागृत करता है और उसे यह आभास कराता है कि जिस ईश्वर को वह बाहर खोज रहा है वह वास्तव में उसके भीतर ही विद्यमान है। भवसागर का अर्थ है जन्म और मृत्यु का वह चक्र जिसमें मनुष्य अपनी वासनाओं और कर्मों के कारण उलझा रहता है और इस विशाल समुद्र को पार करने के लिए भक्ति रूपी नौका और गुरु रूपी खेवनहार का होना अनिवार्य है क्योंकि बिना चप्पू के नाव दिशाहीन होकर लहरों में खो सकती है। जब हम गुरु जनों द्वारा प्रदर्शित मार्ग का अनुसरण करते हैं तो हमें उन नैतिक मूल्यों, धैर्य और संयम की प्राप्ति होती है जो भक्ति के मार्ग को सुगम बनाते हैं। गुरु केवल शास्त्र नहीं पढ़ाते बल्कि वे अपने आचरण से यह सिखाते हैं कि किस प्रकार प्रतिकूल परिस्थितियों में भी विचलित हुए बिना अपनी लौ ईश्वर से लगाए रखनी है। भक्ति में जब गुरु की कृपा सम्मिलित होती है तो साधक का अहंकार गलने लगता है और अहंकार का मिटना ही ईश्वर की प्राप्ति की पहली सीढ़ी है। शास्त्रों में भी कहा गया है कि हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहिं ठौर अर्थात ईश्वर के नाराज होने पर गुरु शरण दे सकते हैं परंतु गुरु के विमुख होने पर भक्ति का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है इसलिए गुरु को गोविंद से भी ऊंचा स्थान दिया गया है क्योंकि गोविंद तक जाने का मार्ग गुरु ने ही प्रशस्त किया है। इस संसार रूपी सागर की लहरें बहुत प्रबल हैं जहाँ लोभ, मोह, क्रोध और अहंकार के भंवर हर क्षण हमें डुबोने का प्रयास करते हैं किंतु जो भाग्यशाली जीव गुरु के वचनों को अपनी जीवन चर्या बना लेते हैं और निरंतर नाम सुमिरन एवं निष्काम भक्ति में लीन रहते हैं उनके लिए यह भवसागर एक छोटे से गड्ढे के समान हो जाता है जिसे वे सुगमता से पार कर लेते हैं। भक्ति का वास्तविक अर्थ केवल कर्मकांड नहीं बल्कि अपने भीतर के विकारों को साफ कर उस परम चेतना के प्रति प्रेम और सेवा का भाव रखना है और जब यह भाव गुरु के मार्गदर्शन में परिपक्व होता है तो मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति होती है और वह जीवन-मरण के बंधन से मुक्त होकर उस शाश्वत आनंद में विलीन हो जाता है जो ईश्वर का वास्तविक स्वरूप है।
