सन्त निरंकारी मिशन द्वारा हरिद्वार स्थित बीएचईएल कम्युनिटी सेंटर, ज्वालापुर में विशाल महिला संत समागम का आयोजन किया गया

हरिद्वार। सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज एवं निरंकारी राजपिता रमित जी के आशीर्वाद स्वरूप आयोजित इस समागम में दिल्ली से आई प्रचारक बहन प्रतीक्षा मिश्रा ने अपने आध्यात्मिक विचार व्यक्त किए। निरंकार परमात्मा ने हरि के द्वार में आज आने का मौका दिया है। हरिद्वार आकर बहुत खुशी हुई है जब भी हरिद्वार का नाम आता है जहन में एक आध्यात्मिक रूप आ जाता है।कितने ही गुरु रहे हैं हो संगतों का हमेशा ये प्यार रहता है कि जो ये ब्रह्मज्ञान हमारे हिस्से में आया है हमे ज्यादा से ज्यादा इनका प्रचार- प्रसार करना है। ताकि ये ख्याल आये की सत्संग सुनने में बड़ा अच्छा लगता है। हर किसी मे परमात्मा है निरंकार का रूप है। क्योंकि ये आत्मा को जो अंश है हर आत्मा में मिला हुआ है। क्योंकि हम सभी परमात्मा के अंश है। मोक्ष क्या है ये मुक्ति क्या है सन्त निरंकारी मिशन एक विचारधारा है। जो आत्मा को परमात्मा से मिलाने का कार्य पूरे संसार के लिए कर रहा है। यहाँ खानपान में कोई बदलाव नही है बस नशे से दूर रहने की बात कही गई है। निरंकारी मिशन परमात्मा के दर्शन कराने का कार्य करता है। बिना कानो के सुनने वाला बिना आंखों के देखने वाला आखिर ये परमात्मा है क्या पढ़ने के बाद ही ये अनुभव हुआ है। जिसके हिस्से में ब्रह्मज्ञान आता है उसके सारे भ्रम स्वयं मिट जाते हैं। परमात्मा का ज्ञान होना बेहद जरूरी है। जैसे ही तन-मन-धन का आत्मसमपर्ण हम करते हैं तब खुद से ही मानव के जीवनमें सरलता आ जाती है और मानव का अहंकार स्वयं खत्म होने लगता है। आज निरंकारी मिशन हमारे अंदर प्यार की अलख जगा रहा है अगर परमात्मा प्यार है तो प्यार में सौदेबाजी नही होती प्रेम का अर्थ केवल समर्पण है। जिसके जीवन मे समर्पण है वो प्रसन्न हो जाता है। पूरे देश में सभी को मानवता के रास्ते पर चलना है। सभी के अंदर परमात्मा को देखना है जब सबके अंदर ईश्वर का रूप दिखेगा तो इंसान के जीवन मे नफरत खत्म हो जाएगी निरंकारी मिशन की विचारधारा पूरे विश्व मे मानवता की पाठशाला खोलकर पूरे विश्व मे शांति भाईचारे का संदेश देने का कार्य कर रहा है। उन्होंने कहा कि “ब्रह्मज्ञान से मनुष्य का विवेक जागृत होता है और परमात्मा के साथ अटूट नाता जुड़ जाता है। इससे हृदय में भक्ति भाव उत्पन्न होने लगता है। संसार में भक्ति अनेक रूपों में की जा रही है—कुछ लोग परमात्मा को जानकर भक्ति करते हैं, जबकि कुछ अनजाने में। अनजाने में की गई भक्ति अक्सर भ्रम पैदा करती है, जबकि सच्ची भक्ति का मार्ग श्रद्धा, विश्वास और समर्पण पर आधारित है।”

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