परमार्थ निकेतन से ओणम के अवसर पर प्रकृति, अन्न और मानवता के सम्मान का संदेश

अजय वर्मा, अश्वनी वर्मा

ऋषिकेश। भारत की विविधतापूर्ण सांस्कृतिक परंपरा में पर्व जीवन-दर्शन, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता, लोक-संस्कृति और सामाजिक समरसता के जीवंत उत्सव हैं। ओणम ऐसा ही एक अनुपम महापर्व है, जो केरल की धरती से निकलकर आज सम्पूर्ण भारत की ‘विविधता में एकता’ की विराट चेतना का प्रतीक बन चुका है। ओणम मुख्यतः फसल, समृद्धि और अन्न के प्रति कृतज्ञता का पर्व है। मलयालम पंचांग के चिंगम मास में अथम से आरंभ होकर तिरुवोणम तक दस दिनों तक चलने वाला यह उत्सव आज केवल केरल तक सीमित नहीं है, बल्कि विश्वभर में बसे मलयाली समुदाय द्वारा श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। ओणम पर्व राजा महाबली और भगवान विष्णु के वामन अवतार से जुड़ी है। महाबली एक न्यायप्रिय, उदार और प्रजावत्सल राजा थे। उनके शासनकाल में समृद्धि, समानता और खुशहाली थी। भगवान विष्णु ने वामन रूप धारण कर उनसे तीन पग भूमि मांगी। महाबली ने अपना वचन निभाया और जब वामन ने विराट रूप धारण कर दो पगों में पृथ्वी और आकाश नाप लिया, तब तीसरे पग के लिए महाबली ने अपना शीश अर्पित कर दिया। उनकी भक्ति, त्याग और सत्यनिष्ठा से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें वर्ष में एक बार अपनी प्रजा से मिलने की अनुमति दी। इसी वार्षिक आगमन की स्मृति में ओणम मनाए जाने की परंपरा चली आ रही है। ओणम भारतीय संस्कृति में सामाजिक समरसता और लोकएकता का अत्यंत सुंदर उदाहरण है। ओणम का दूसरा महत्वपूर्ण आयाम है, अन्न और कृषि के प्रति कृतज्ञता। वर्षा ऋतु के पश्चात चिंगम मास किसानों के लिए नई आशा और समृद्धि का संदेश लेकर आता है। खेतों में नई फसल, घरों में अन्न की सम्पन्नता और प्रकृति में हरियाली, इन सबके प्रति आभार व्यक्त करने का यह पर्व हमें स्मरण कराता है कि हमारी थाली तक पहुँचा प्रत्येक अन्नकण किसी किसान के परिश्रम, धरती की उर्वरता, जल की कृपा और सूर्य की ऊर्जा का परिणाम है। पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने ओणम की शुभकामनाएँ देते हुए कहा कि ओणम अर्थात् समृद्धि। ओणम का संदेश है, अन्न का सम्मान करें, अन्नदाता का सम्मान करें और अन्न को प्रसाद मानकर साझा करें। जिस धरती ने हमें अन्न दिया, जिस जल ने खेतों को सींचा और जिस किसान ने अपने श्रम से हमारी थाली भरी, उनके प्रति कृतज्ञ होना ही सच्ची संस्कृति है। पर्व तभी सार्थक हैं जब वे हमारे भीतर सेवा, करुणा, समरसता और प्रकृति-संरक्षण की भावना जागृत करें। उन्होंने कहा कि आज जब विश्व जलवायु परिवर्तन, जल संकट, मृदा क्षरण और खाद्य सुरक्षा जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब भारत के पारंपरिक कृषि पर्व आधुनिक विश्व को भी एक महत्वपूर्ण दिशा दे सकते हैं। धरती को केवल संसाधन नहीं, माता मानना; अन्न को केवल वस्तु नहीं, प्रसाद मानना और किसान को केवल उत्पादक नहीं, अन्नदाता मानना, यही भारतीय जीवन-दृष्टि है।पूज्य स्वामी जी ने कहा कि आज आवश्यकता है कि हम पर्वों के मूल संदेश को अपने जीवन का संस्कार बनाएँ। ओणम का पुक्कलम हमें संदेश देता है कि अलग-अलग रंग और फूल मिलकर ही सुंदरता रचते हैं। आज ओणम भारत की उस सनातन चेतना का उत्सव है जो कहती हैए सबका मंगल हो, सबके जीवन में अन्न, आनंद और सम्मान हो तथा प्रकृति और मानव के बीच प्रेम का संबंध बना रहे।

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