अजय वर्मा, अश्वनी वर्मा
ऋषिकेश। मॉरीशस गणराज्य के पूर्व राष्ट्रपति महामहिम श्री पृथ्वीराजसिंह रूपन जी ने परमार्थ निकेतन आये। परम पावन माँ गंगा के तट पर आयोजित विश्वविख्यात गंगा आरती में सहभाग किया। परमार्थ पीठाधीश्वर पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी तथा पूज्य साध्वी भगवती सरस्वती जी के पावन सान्निध्य में यह अवसर भारत और मॉरीशस के बीच सांस्कृतिक आत्मीयता, आध्यात्मिक संबंधों और साझा परम्पराओं की सुंदर अभिव्यक्ति है। माँ गंगा की अविरल धारा, मंत्रोच्चार, वैदिक प्रार्थनाओं और दीपों की दिव्य आभा के बीच महामहिम श्री रूपन जी ने भारतीय आध्यात्मिक परम्परा की उस जीवंत चेतना का अनुभव किया, जो प्रकृति के प्रति श्रद्धा, समस्त जीवन के प्रति सम्मान और मानवता के कल्याण का संदेश देती है। गंगा आरती के इस पावन वातावरण में भारत की प्राचीन ऋषि परम्परा और मॉरीशस की भारतीय सांस्कृतिक जड़ों के बीच आत्मीय संबंध सहज रूप से प्रतिबिंबित हुए। इस अवसर पर तुलसी पूजन एवं दीप प्रज्वलन भी किया गया। श्री पृथ्वीराजसिंह रूपन जी ने मॉरीशस की सांस्कृतिक परम्पराओं का उल्लेख करते हुए बताया कि हमारे यहां घर के मुख्य द्वार के बाहर तुलसी का पौधा रखने और उसके समीप दीप प्रज्वलित करने की परम्परा है। यह परम्परा इस बात का सुंदर उदाहरण है कि भौगोलिक दूरियाँ बढ़ जाने पर भी सांस्कृतिक स्मृतियाँ, आस्था और पारिवारिक संस्कार पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवंत बने रह सकते हैं। भारत और मॉरीशस के बीच यह समानता केवल धार्मिक समानता नहीं, बल्कि उन गहरी सांस्कृतिक जड़ों की पहचान है। पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि भारत और मॉरीशस का संबंध केवल दो देशों की मैत्री नहीं, बल्कि दो भूभागों में प्रवाहित एक ही सांस्कृतिक चेतना, साझा संस्कारों और सनातन मूल्यों की अमर धारा है। समुद्र भले ही दोनों देशों के बीच हो, परंतु हृदयों को जोड़ने वाली संस्कृति की जड़ें कभी दूर नहीं होतीं। मॉरीशस में जीवंत भारतीय परम्पराएँ, रामायण के प्रति श्रद्धा, तुलसी पूजन, दीप प्रज्वलन और पारिवारिक संस्कार इस बात के साक्षी हैं कि अपनी जड़ों से जुड़ा समाज अपनी पहचान को पीढ़ियों तक सुरक्षित रख सकता है। हमारी संस्कृति की वास्तविक शक्ति उसकी प्राचीनता में ही नहीं, बल्कि उसकी कालजयी प्रासंगिकता में है। आज आवश्यकता है कि हम अपनी विरासत को केवल स्मृतियों में न रखें, बल्कि अपने आचरण में उतारें। संस्कृति जब संस्कार बनती है, संस्कार जब व्यवहार बनते हैं और व्यवहार जब मानवता की सेवा बनता है, तभी राष्ट्रों के संबंध आत्मीयता के शाश्वत सेतु बन जाते हैं। पूज्य साध्वी भगवती सरस्वती जी ने कहा कि हमारी परम्पराएँ हमें अपनी जड़ों से जोड़ती हैं। परिवारों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ने वाले संस्कार, पूजा-पद्धतियाँ, भजन, रामायण का पाठ और प्रकृति के प्रति श्रद्धा हमारी साझा विरासत को जीवंत रखते हैं। इन मूल्यों को नई पीढ़ी तक पहुँचाना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है, ताकि आधुनिकता के साथ आगे बढ़ते हुए भी हम अपनी सांस्कृतिक पहचान, मानवीय संवेदनाओं और आध्यात्मिक चेतना को सुरक्षित रख सकें। श्री पृथ्वीराजसिंह रूपन जी ने कहा कि भारत और मॉरीशस के संबंधों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में भारतीय मूल के लोगों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। पीढ़ियों पहले भारत से मॉरीशस पहुँचे लोगों ने अपनी मेहनत, आस्था, भाषा, धार्मिक परम्पराओं और सांस्कृतिक मूल्यों के माध्यम से अपनी पहचान को संजोए रखा। रामायण, भक्ति संगीत, भारतीय त्योहारों, पारिवारिक संस्कारों और मंदिरों की परम्पराओं ने दोनों देशों के बीच आत्मीय संबंधों को निरंतर सुदृढ़ किया है। आज ये संबंध सांस्कृतिक आदान-प्रदान, आध्यात्मिक संवाद और पारस्परिक सम्मान के माध्यम से नई पीढ़ियों को भी जोड़ रहे हैं। आदिकवि महर्षि वाल्मीकि जी की अमर कृति रामायण हमें कर्तव्य, धर्म, त्याग, मर्यादा, परहित और आदर्श जीवन की हमें प्रेरणा देती है और भक्तिशिरोमणि मीराबाई जी की अनन्य कृष्णभक्ति प्रेम, समर्पण और अटूट श्रद्धा का दिव्य संदेश देती है। इन महान विभूतियों की ज्ञान-साधना और भक्ति की दिव्य धारा हम सभी के जीवन में सदाचार, करुणा, प्रेम एवं आध्यात्मिक चेतना का प्रकाश जगाए तथा हम उनके आदर्शों को आत्मसात कर एक श्रेष्ठ समाज और सशक्त राष्ट्र के निर्माण में सहभागी बनें।
