विश्वविख्यात श्री जगन्नाथ रथयात्रा के पावन अवसर पर परमार्थ निकेतन से समस्त श्रद्धालुओं एवं भक्तों को हार्दिक शुभकामनाएँ

अजय वर्मा, अश्वनी कुमार

ऋषिकेश/प्रयागराज। विश्वविख्यात श्री जगन्नाथ रथयात्रा के पावन अवसर पर परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष, परमार्थ पीठाधीश्वर, पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने सभी श्रद्धालुओं को शुभकामनाएँ देते हुए कहा कि श्री जगन्नाथ रथयात्रा वह दिव्य महापर्व है, जहाँ भक्त भगवान के दर्शन के लिए नहीं जाते, बल्कि भगवान स्वयं अपने भक्तों के बीच आते हैं। यही इस पर्व की सबसे बड़ी विशेषता है और यही सनातन संस्कृति का जीवंत दर्शन है। पूज्य स्वामीजी ने कहा कि भगवान श्रीहरि का दिव्य संदेश-नाहं वसामि वैकुण्ठे योगिनां हृदये न च। मद्भक्ता यत्र गायन्ति तत्र तिष्ठामि नारद। भगवान श्री जगन्नाथ अपने अग्रज भगवान बलभद्र, भगिनी सुभद्रा तथा चक्रराज सुदर्शन के साथ भव्य रथों पर आरूढ़ होकर श्रीमंदिर से गुण्डिचा मंदिर तक यात्रा करते हैं। यह ईश्वर और जीव के दिव्य मिलन, करुणा, समरसता और लोकमंगल का अद्भुत उत्सव है। पूज्य स्वामीजी ने बताया कि विगत 25 फरवरी, 2025 को तीर्थराज प्रयागराज की पावन त्रिवेणी संगम स्थली पर स्थित परमार्थ त्रिवेणी पुष्प में सम्पन्न भगवान श्री जगन्नाथ धाम मन्दिर स्थापना एवं प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव ने उत्तर और पूर्व भारत की सांस्कृतिक विरासतों को एक सूत्र में जोड़ते हुए एक भारत, श्रेष्ठ भारत की भावना को साकार किया। उन्होंने कहा कि जगन्नाथ अर्थात् जगत के नाथ, सम्पूर्ण सृष्टि के स्वामी हैं। वे किसी एक जाति, वर्ग, भाषा अथवा सम्प्रदाय के नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के आराध्य हैं। उनके विशाल नेत्र समस्त सृष्टि पर समान करुणा की दृष्टि रखते हैं और उनका स्वरूप हमें संदेश देेता है कि ईश्वर सीमाओं में नहीं, बल्कि प्रत्येक हृदय में निवास करते हैं। भगवान का प्रतिवर्ष गुण्डिचा मंदिर की यात्रा पर जाना इस सत्य का प्रतीक है कि परमात्मा स्वयं अपने भक्तों तक पहुँचते हैं और समाज के प्रत्येक व्यक्ति को प्रेम, सेवा और समानता का संदेश देते हैं। उन्होंने कहा कि रथ की रस्सी को खींचना एक दिव्य अनुष्ठान है साथ ही अपने जीवनरूपी रथ को अहंकार, स्वार्थ और अज्ञान से मुक्त कर धर्म, सेवा और ईश्वर की दिशा में अग्रसर करने का प्रतीक भी प्रतीक है। जब लाखों श्रद्धालु बिना किसी भेदभाव के एक ही रस्सी को पकड़ते हैं, तब ’वसुधैव कुटुम्बकम् का सनातन संदेश जीवंत हो उठता है। स्वामीजी ने प्रयागराज में सम्पन्न श्री जगन्नाथ धाम स्थापना एवं प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव को स्मरण करते हुए कहा कि उड़ीसा के माननीय मुख्यमंत्री श्री मोहन चरण माझी जी की गरिमामयी उपस्थिति ने इस आयोजन को राष्ट्रीय एकात्मता का ऐतिहासिक पर्व बना दिया। प्रयागराज में स्थापित श्री जगन्नाथ धाम आने वाले समय में आध्यात्मिक चेतना, भारतीय संस्कृति, सेवा, संस्कार और राष्ट्रीय एकता का प्रेरणास्रोत बनेगा। यह धाम उत्तर और पूर्व भारत के मध्य सांस्कृतिक सेतु के रूप में कार्य करते हुए देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं को भारतीय आध्यात्मिक परम्पराओं से जोड़ने का महत्वपूर्ण केन्द्र सिद्ध होगा।उन्होंने कहा कि आज जब विश्व विभाजन, हिंसा, पर्यावरण संकट और मानवीय संवेदनाओं के क्षरण जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब श्री जगन्नाथ रथयात्रा हमें सेवा, समरसता, करुणा, पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक एकता और लोकमंगल का मार्ग दिखाती है। यह महापर्व हमें प्रेरित करता है कि हम अपने भीतर के अहंकार का त्याग करें, सेवा को साधना बनाएँ और मानवता को अपना सर्वोच्च धर्म मानें। पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने सभी श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे भगवान श्री जगन्नाथ के सार्वभौमिक प्रेम, करुणा और समरसता के संदेश को अपने जीवन में धारण करें तथा प्रकृति संरक्षण, सामाजिक सद्भाव और राष्ट्र निर्माण के संकल्प के साथ एक ऐसे समाज का निर्माण करें, जहाँ प्रेम, सेवा, संस्कृति और आध्यात्मिकता जीवन के मूल आधार बनें। प्रभु श्री जगन्नाथ सभी के जीवन में सुख, शांति, उत्तम स्वास्थ्य, समृद्धि एवं आध्यात्मिक जागरण का प्रकाश फैलाएँ।

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