गौवत्स श्री राधाकृष्ण जी पधारे परमार्थ निकेतन

अजय वर्मा, अश्वनी वर्मा

ऋषिकेश। परमार्थ निकेतन में गौवत्स श्री राधाकृष्ण जी के पावन आगमन हुआ, परमार्थ गुरूकुल के ऋषिकुमारों और आचार्यों ने शंख ध्वनि और पूष्प वर्षा कर अभिनन्दन किया। परमार्थ निकेतन परिसर में सनातन की दिव्य अखण्ड कथा के रूप में निरंतर प्रवाहित हो रही है। परमार्थ निकेतन आज वैश्विक स्तर पर आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय आयोजनों के एक विशिष्ट वैश्विक डेस्टिनेशन के रूप में अपनी पहचान स्थापित कर चुका है। हिमालय की गोद और माँ गंगा के पावन तट पर स्थित परमार्थ निकेतन में देश-विदेश से आने वाले साधक, संत, आध्यात्मिक गुरु, विद्वान, कलाकार और विभिन्न क्षेत्रों के विशिष्ट अतिथि दिव्य आयोजनों का हिस्सा बनते हैं। यहाँ होने वाला प्रत्येक आयोजन भारतीय सनातन संस्कृति, योग, ध्यान, गंगा-सेवा, पर्यावरण चेतना और विश्वबंधुत्व का संदेश लेकर वैश्विक समुदाय तक पहुँचता है। परमार्थ निकेतन में आयोजन एक आध्यात्मिक अनुभव बन जाते हैं। कथाओं के आयोजन के रूप में माँ गंगा के तट पर भक्ति की एक ऐसी तरंग प्रस्फुटित होती है जिसमें गौ, गंगा, गोविन्द और गुरु-परम्परा के सनातन सूत्रों का साधक एक साथ अनुभव करते हैं। भारतीय संस्कृति में कथा वह सेतु है जो हमें अपने भीतर छिपे दिव्यत्व से जोड़ती है। कथा के शब्द बाहर से कानों में प्रवेश करते हैं, पर उनका वास्तविक प्रयोजन भीतर के मौन तक पहुँचना है। जब कथा हृदय में उतरती है, तब श्रोता केवल कथा नहीं सुनता, वह स्वयं को सुनना प्रारम्भ करता है।वर्तमान समय में हम बाहरी उपलब्धियों के बीच भीतर से रिक्त होते जा रहे हैं, तब कथाएँ हमारे जीवन को पुनः उसकी जड़ों से जोड़ती हैं। वे हमें स्मरण कराती हैं कि हमारी संस्कृति केवल प्राचीन स्मृतियों का संग्रह नहीं, बल्कि आज भी जीवित, स्पंदित और मार्गदर्शक जीवन-दृष्टि है। गौवत्स श्री राधाकृष्ण जी ने कहा कि परमार्थ निकेतन की पावन धरा पर आगमन स्वयं सनातन की करुणा, भक्ति और प्रेम का साकार स्पर्श है। जहाँ गौ में मातृत्व और करुणा का दर्शन होता है, जहाँ गंगा में पवित्रता और मोक्ष की धारा प्रवाहित होती है और जहाँ गोविन्द में प्रेम का परम स्वरूप अनुभव होता है तथा कथा इन सभी भावों को एक दिव्य अनुभूति में पिरो देती है। परमार्थ निकेतन में यह कथा-यात्रा सनातन चेतना को जन-जन तक पहुँचाने का एक सुंदर माध्यम है। यहाँ माँ गंगा बाहर बह रही हैं और कथा भीतर बह रही है, गंगा की निर्मल धारा तन-मन को पावन करती है, तो कथा की अमृतधारा अंतर्मन को स्पर्श कर चेतना को जागृत करती है। एक धारा जीवन को शुद्ध करती है, दूसरी जीवन के अर्थ को प्रकाशित करती है, यही परमार्थ की दिव्यता है।

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