परमार्थ विद्या मन्दिर में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व श्रद्धा, उल्लास और आध्यात्मिक भाव के साथ मनाया गया

अजय वर्मा, अश्वनी वर्मा

ऋषिकेश। परमार्थ विद्या मन्दिर में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व श्रद्धा, उल्लास और आध्यात्मिक भाव के साथ मनाया गया। विद्यालय के छात्र-छात्राओं और शिक्षकों ने भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव को जीवन में धर्म, प्रेम, विवेक, करुणा, साहस और कर्तव्य को जागृत करने के संकल्प-पर्व के रूप में मनाया। श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव उस दिव्य क्षण का स्मरण है, जब अंधकार के मध्य प्रकाश का प्राकट्य हुआ। यह केवल द्वापर युग की एक घटना नहीं, बल्कि मानव-चेतना के लिए सनातन संदेश है कि जब जीवन के भीतर भय बढ़ता है, जब सत्य पर संकट आता है, जब अधर्म अपना प्रभाव बढ़ाता है, तब ईश्वर किसी न किसी रूप में हमारे भीतर सत्य का दीप प्रज्वलित करते हैं। जन्माष्टमी हमें यह भी स्मरण कराती है कि श्रीकृष्ण का जन्म किसी राजमहल में नहीं, बल्कि कारागार के अंधकार में हुआ। यह सनातन दर्शन का अत्यंत गहरा संदेश है, परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी विपरीत क्यों न हों, दिव्यता को जन्म लेने से कोई कारागार रोक नहीं सकता। बाहर का अंधकार प्रकाश को रोक नहीं सकता, यदि भीतर विश्वास जीवंत हो। परमार्थ विद्या मन्दिर में बच्चों ने श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप की झाँकी, भक्ति एवं सांस्कृतिक प्रस्तुतियों तथा विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से जन्मोत्सव की दिव्यता को जीवंत किया। नन्हे-नन्हे बालकों का कृष्ण-राधा स्वरूप अत्यंत आकर्षित करने वाला था, यह हमारी उस सनातन परंपरा का सुंदर प्रतिबिंब था जिसमें संस्कार पुस्तकों से पहले उत्सवों के माध्यम से बच्चों के हृदय में उतरते हैं। श्रीकृष्ण भारतीय संस्कृति के ऐसे अद्भुत व्यक्तित्व हैं जिनमें जीवन का कोई एक पक्ष नहीं, बल्कि सम्पूर्ण जीवन समाहित है। वे माखनचोर भी हैं और मनमोहन भी, बालसखा भी हैं और जगद्गुरु भी, बांसुरीधर भी हैं और सुदर्शनधारी भी। वे प्रेम की मधुरता भी सिखाते हैं और धर्म की दृढ़ता भी। वे जीवन से भागने का मार्ग नहीं बताते, बल्कि जीवन के मध्य खड़े होकर उसे धर्ममय बनाने की कला सिखाते हैं। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन को केवल युद्ध करना नहीं सिखाते, वे अपने भीतर के मोह, भय और भ्रम से युद्ध करना सिखाते हैं। यही शिक्षा आज के बच्चों और युवाओं के लिए अत्यंत आवश्यक है। आज का कुरुक्षेत्र बाहर से अधिक भीतर है, तुलना, तनाव, असफलता का भय, सोशल मीडिया का आकर्षण, त्वरित सफलता की चाह और सही-गलत के बीच बढ़ता भ्रम। ऐसे समय में श्रीकृष्ण की गीता युवा मन को बताती है कि अपने कर्तव्य पर विश्वास रखो, कर्म को पूजा बनाओ और परिणाम की चिंता से स्वयं को मुक्त करो।

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