मासिक मानस कथा का दिव्य, अलौकिक, अद्भुत शुभारम्भ

अजय वर्मा, अश्वनी वर्मा

ऋषिकेश। हिमालय की गोद में विराजित, माँ गंगा के निर्मल तट पर स्थित परमार्थ निकेतन में मासिक श्रीरामचरितमानस कथा का शुभारम्भ हुआ। परम पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी एवं पूज्य साध्वी भगवती सरस्वती जी के पावन सान्निध्य और आशीर्वाद से कथा व्यास संत श्री मुरलीधर जी महाराज के श्रीमुख से मानस कथा का अमृतमय प्रवाह प्रवाहित हुआ।

 

पूज्य संतों एवं यजमान परिवार द्वारा 34 दिवसीय मानस कथा का शंखनाद दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। सम्पूर्ण वातावरण शंखध्वनि, वेदमंत्रों और रामनाम से गुंजायमान हो उठा।

 

पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने अपने आशीर्वचनों में कहा कि मानस कथा जीवन से भागना नहीं, बल्कि जीवन में रहते हुए जीवन के बंधनों से मुक्त होना सिखाती है। उन्होंने कहा कि जब मनुष्य ‘मैं’ से ‘हम’ की यात्रा पर निकल पड़ता है, वहीं से जीवन में मानस आरम्भ हो जाती है। यही कथा हमें स्मरण कराती है कि हमारा अस्तित्व अकेला नहीं, बल्कि ईश्वर, प्रकृति और समस्त सृष्टि से जुड़ा हुआ है।

 

उन्होंने अन्तर्राष्ट्रीय परिवार दिवस के अवसर पर कहा कि सम्पूर्ण विश्व को एक परिवार के रूप में देखना ही सनातन संस्कृति का शाश्वत संदेश है। “वसुधैव कुटुम्बकम्” केवल एक मंत्र नहीं, बल्कि मानवता को जोड़ने वाली दिव्य चेतना है, जो हजारों वर्षों से वन अर्थ, वन फैमिली और वन फ्यूचर के भाव को साकार करती आ रही है। सनातन संस्कृति हमें सिखाती है कि समस्त सृष्टि एक ही परमात्मा की संतान है, इसलिए प्रेम, करुणा, सहअस्तित्व और आत्मीयता ही मानव जीवन का वास्तविक आधार हैं।

 

पूज्य स्वामीजी ने श्री दैवी सम्पद् मण्डल की गौरवशाली संत परम्परा, पूज्य महामण्डलेश्वर स्वामी शुकदेवानन्द जी महाराज, पूज्य स्वामी सदानन्द जी महाराज को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि संत शरीर से दूर हो सकते हैं, परन्तु उनकी चेतना सदैव मार्गदर्शन करती रहती है। उनकी तपस्या आज भी इस भूमि को पावन बना रही है।

 

कथा व्यास संत श्री मुरलीधर जी महाराज ने कहा कि परमार्थ निकेतन वह धरा है जहाँ जल प्रवाह रूपी गंगा और वाणी प्रवाह रूपी गंगा दोनों का संगम होता है। यहाँ केवल कथा नहीं सुनाई जाती, यहाँ आत्मा को उसकी दिशा मिलती है। कथा जीवन के सारे दुःखों को दूर कर आनंद प्रदान कराती है।

 

पूज्य साध्वी भगवती सरस्वती जी ने अत्यंत भावपूर्ण शब्दों में कहा कि माँ गंगा के तट पर 34 दिनों तक कथा श्रवण करने का अवसर मिलना केवल संयोग नहीं, बल्कि ईश्वर की विशेष कृपा है। उन्होंने कहा कि ऋषिकेश बुलावे से आया जाने वाला तीर्थ है। यहाँ की हवा में मंत्रों की सुगंध है, यहाँ की मिट्टी में ऋषियों की तपस्या है, यहाँ बैठना ही ध्यान है और यहाँ बहती माँ गंगा स्वयं मोक्ष का मार्ग है।

 

पूज्य स्वामीजी ने यजमान श्री शंकर कुलरिया जी, श्रीमती पार्वती कुलरिया जी, पुत्री मनीषा कुलरिया एवं राजस्थान सहित देशभर से आये श्रद्धालुओं का अभिनन्दन करते हुए कहा कि जब भक्तिभाव से परिवार जुड़ता है तो वह केवल परिवार नहीं रहता, वह तीर्थ बन जाता है।

 

इस शुभ अवसर पर पूज्य स्वामीजी एवं पूज्य साध्वी जी ने संत श्री मुरलीधर जी महाराज एवं माँ मीना माता जी को रुद्राक्ष का पौधा भेंट कर पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया। यह आने वाली पीढ़ियों के लिए हरित आशीर्वाद है। इसी के साथ पर्यावरण को समर्पित 34 दिवसीय मानस कथा का दिव्य शंखनाद हुआ।

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