अजय वर्मा, अश्वनी वर्मा
हरिद्वार। भूपतवाला स्थित प्रसिद्ध श्री पावन धाम आश्रम में कथा व्यास श्री राजेंद्र पुरोहित जी ने अपने श्री मुख से इस पावन कथा का दृष्टांत सुनते हुए कहा श्रीमद्भागवत महापुराण केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि साक्षात श्री कृष्ण का वांग्मय स्वरूप है जो कलयुग के घोर अंधकार में भटकते हुए मानव के लिए एक दैवीय प्रकाश स्तंभ के समान है। इस परम पावन कथा को ‘कल्याण सुधारस’ इसलिए कहा गया है क्योंकि इसका श्रवण मात्र ही अंतरात्मा को तृप्त कर देता है और जीवन के समस्त संतापों का हरण कर लेता है। जब मनुष्य सांसारिक माया-मोह, चिंताओं और मानसिक व्याधियों से घिरा होता है, तब भागवत कथा की अमृतमयी धारा उसके हृदय के मैल को धोकर उसे निर्मल बना देती है। इस कथा की महिमा का वर्णन करते हुए शास्त्रों में कहा गया है कि जो पुण्य बड़े-बड़े यज्ञों, तपस्याओं और तीर्थाटन से भी दुर्लभ है, वह भक्ति भाव से भागवत श्रवण करने मात्र से सहज ही प्राप्त हो जाता है। यह कथा मनुष्य को जीना सिखाती है और अंत समय में उसे निर्भय होकर मृत्यु का आलिंगन करने की शक्ति प्रदान करती है, जैसा कि राजा परीक्षित के प्रसंग से प्रमाणित होता है। भागवत कथा का प्रत्येक श्लोक और प्रत्येक प्रसंग मानव जीवन की सार्थकता का बोध कराता है। यह हमें सिखाती है कि संसार की वस्तुएं नश्वर हैं और केवल परमात्मा की भक्ति ही शाश्वत सत्य है। जब श्रोता एकाग्रचित्त होकर भगवान की लीलाओं का रसपान करता है, तो उसके भीतर सोई हुई चेतना जागृत हो उठती है और वह स्वयं को उस परम सत्ता के निकट अनुभव करने लगता है। इस कथा के श्रवण से न केवल वर्तमान जीवन के कष्ट मिटते हैं, बल्कि सात पीढ़ियों तक के पितरों का उद्धार हो जाता है और परलोक का मार्ग भी निष्कंटक हो जाता है। यह वह पारस पत्थर है जिसके स्पर्श से पापी से पापी व्यक्ति का हृदय भी भक्ति भाव से भर जाता है। कलयुग के दोषों से बचने का इससे सुलभ और श्रेष्ठ कोई अन्य उपाय नहीं है। वास्तव में, जिस हृदय में श्रीमद्भागवत कथा का वास हो जाता है, वहां साक्षात नारायण निवास करने लगते हैं और फिर उस जीव को मोक्ष के लिए किसी अन्य द्वार पर भटकने की आवश्यकता नहीं रहती। यह कथा हमारे बिखरे हुए जीवन को समेटकर उसे परमात्मा के चरणों में समर्पित करने का महान माध्यम है, जिससे मानव जीवन वास्तव में धन्य और सार्थक हो जाता है। इस पावन कथा का आयोजन राजकोट से पधारे श्री जयंती भाई ने अपने परिजनों के साथ पावन नगरी हरिद्वार आकर कराया।
