कल्याण की युक्ति और मुक्ति का मार्ग गुरु चरणों से होकर जाता है : स्वामी कमलानन्द गिरी

अजय वर्मा, अश्वनी वर्मा

हरिद्वार। भूपतवाला मुखिया गली स्थित प्रसिद्ध श्री कल्याण कमल आश्रम में परमात्मा स्वरुप 1008 महामंडलेश्वर स्वामी कल्याणानन्द गिरि जी महाराज की पतित पावन स्मृति में प्रातः स्मरणीय परम तपस्वी परम विद्वान महामंडलेश्वरश्री स्वामी कमलानन्द गिरि जी महाराज पतित पावन सानिध्य में विशाल संत समागम तथा भंडारे का आयोजन किया गया इस अवसर पर महामंडलेश्वर श्री हरि चेतनानंद महाराज के परम कल्याणकारी पावन वचनों ने भक्तों को भाव विभोर कर दिया इस अवसर पर अपने श्री मुख से उद्गार व्यक्त करते हुए महामंडलेश्वर प्रातः स्मरणीय श्री स्वामी कमलानन्द गिरि जी महाराज ने कहागुरु का पावन सानिध्य उस अनंत सागर की तरह है जिसकी गहराई को नापना असंभव है। इस कलयुग के कठिन समय में, जहाँ मनुष्य केवल स्वार्थ, ईर्ष्या और भौतिक सुखों की अंधी दौड़ में खोया हुआ है, वहाँ सतगुरु की कृपा ही वह एकमात्र सहारा है जो हमें डूबने से बचाती है। गुरु केवल एक शिक्षक नहीं, बल्कि वह दिव्य ऊर्जा हैं जो हमारे भीतर के अंधकार को अपनी ज्ञान रूपी रश्मियों से मिटा देते हैं। उनके मुख से निकले शब्द कोई साधारण ध्वनि नहीं, बल्कि वे मंत्र हैं जो सीधे आत्मा पर प्रहार करते हैं और सोई हुई चेतना को जाग्रत कर देते हैं। महामंडलेश्वर स्वामी कमलानंद गिरि महाराज ने कहा जब हम संसार की उलझनों में फंसकर स्वयं को अकेला और असहाय पाते हैं, तब गुरु के पावन वचन ही हमें यह बोध कराते हैं कि हम केवल एक हाड़-मांस का पुतला नहीं, बल्कि उस परमात्मा का ही अंश हैं। वे हमें सिखाते हैं कि कैसे इस नश्वर संसार में रहते हुए भी कमल के फूल की तरह निर्लिप्त रहना है। गुरु की महिमा का गुणगान करते हुए यह समझना आवश्यक है कि वे केवल हमारे इस वर्तमान जीवन को ही सुखी नहीं बनाते, बल्कि वे हमारे कर्मों का शोधन कर हमारे परलोक का मार्ग भी निष्कंटक कर देते हैं। एक शिष्य के लिए गुरु का स्थान ईश्वर से भी ऊपर माना गया है क्योंकि ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग भी गुरु ही दिखाते हैं। उनके वचनों में वह शक्ति है जो हमारे प्रारब्ध को बदलने की सामर्थ्य रखती है। इस कलुषित युग में, जहाँ मन निरंतर चंचल और विकारों से घिरा रहता है, वहाँ गुरु की दृष्टि मात्र से हृदय में भक्ति और प्रेम का संचार होने लगता है। उनके सानिध्य में आने वाला हर प्राणी अपनी चिंताओं को भूलकर एक अभूतपूर्व शांति का अनुभव करता है। गुरु ही वह पारस पत्थर हैं जो अपने शिष्य रूपी लोहे को छूकर उसे सोने जैसा बहुमूल्य बना देते हैं। वास्तव में, मानव जीवन की सार्थकता इसी में है कि हम गुरु के बताए मार्ग पर बिना किसी तर्क-वितर्क के चलें और उनके वचनों को अपने जीवन का आधार बना लें। उनके चरणों में ही चारों धाम हैं और उनके हृदय में संपूर्ण ब्रह्मांड का प्रेम समाया हुआ है। जो सौभाग्यशाली जीव गुरु की शरण पा लेता है, उसे फिर किसी अन्य स्वर्ग की अभिलाषा नहीं रहती, क्योंकि गुरु का दरबार ही मोक्ष का द्वार है।

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