जनार्दन आश्रम के महंत स्वामी रामचरण दास महाराज ने अपने उत्तराधिकारी हर्ष दास महाराज का किया पट्टाभिषेक

अजय वर्मा, अश्वनी वर्मा

हरिद्वार। हिल बाईपास रोड खड़खड़ी स्थित श्री जनार्दन आश्रम में गुरु शिष्य परंपरा के अंतर्गत महंताई चादर विधि श्री रामानंद श्री वैष्णव मंडल हरिद्वार विरक्त श्री रामानंद श्री वैष्णव समिति ऋषिकेश षड दर्शन साधु समाजगुरु तथा महामंडलेश्वर महंत श्री महंत तथा संत महापुरुषों के पावन सानिध्य में परम पूज्य स्वामी रामचरण दास जी महाराज ने अपने सेवाभावी शिष्य हर्ष दास महाराज का अपने उत्तराधिकारी के रूप में पट्टा अभिषेक चादर विधि संत महापुरुषों की गरिमा मय उपस्थित संपन्न हुई इस अवसर पर बोलते हुए प्रातः स्मरणीय गुरु भगवान श्री महंत विष्णु दास महाराज ने कहा परंपरा भारतीय संस्कृति की वह अमूल्य धरोहर है जिसने ज्ञान, संस्कार और जीवन मूल्यों की अखंड धारा को युगों तक प्रवाहित किया है। यह केवल शिक्षा देने और प्राप्त करने का साधारण संबंध नहीं था, बल्कि यह आत्मा से आत्मा का जुड़ाव था, जिसमें गुरु को ज्ञान का प्रकाश और शिष्य को उस प्रकाश को ग्रहण करने वाली ज्योति माना जाता था। प्राचीन काल में जब विद्यालयों और विश्वविद्यालयों की आधुनिक व्यवस्था नहीं थी, तब गुरुकुल परंपरा के माध्यम से शिक्षा प्रदान की जाती थी। आध्यात्मिक गुरु ईश्वर का ज्ञान हमें देने के साथ-साथ ईश्वर की अनुभूति कराते हुए हमारे मनुष्य जीवन को सार्थक कर देते हैं एक गुरु अपने द्वारा स्थापित आश्रम संस्था को उनके उपरांत निरंतर चलाए रखने के लिए योग्य शिष्य का समय रहते चयन करते हैं शिष्य गुरु के आश्रम में रहकर न केवल वेद, शास्त्र, धनुर्विद्या, राजनीति और विज्ञान का ज्ञान प्राप्त करता था, बल्कि अनुशासन, सेवा, त्याग, संयम और सदाचार जैसे जीवनोपयोगी गुण भी सीखता था। गुरु शिष्य को अपने पुत्र के समान स्नेह देता था और शिष्य गुरु को पिता तुल्य सम्मान प्रदान करता था। इस संबंध की नींव विश्वास, श्रद्धा और समर्पण पर आधारित होती थी। गुरु का स्थान समाज में अत्यंत उच्च माना गया है क्योंकि वही अज्ञान के अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश फैलाता है। परम पूज्य बाबा हठ योगी जी महाराज ने कहा हमारे ग्रंथों में गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश के समान पूजनीय बताया गया है, क्योंकि वह सृजन, पालन और संहार अर्थात अज्ञान का नाश करने की क्षमता रखता है। श्री महंत रघुवीर दास महाराज ने कहा इतिहास में अनेक उदाहरण मिलते हैं जहाँ गुरु और शिष्य के आदर्श संबंधों ने समाज को दिशा दी। चाहे वह ऋषि और उनके शिष्यों की कथा हो या युद्धभूमि में ज्ञान प्रदान करने की परंपरा, हर स्थान पर गुरु ने शिष्य को केवल विद्या ही नहीं बल्कि धर्म और कर्तव्य का बोध भी कराया। गुरु शिष्य परंपरा का मूल उद्देश्य केवल आजीविका कमाने योग्य बनाना नहीं था, बल्कि व्यक्ति को नैतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक रूप से परिपक्व बनाना था। इस परंपरा में शिक्षा को व्यापार नहीं बल्कि साधना माना जाता था। समय के साथ शिक्षा प्रणाली में अनेक परिवर्तन हुए, तकनीक का विकास हुआ और ज्ञान प्राप्ति के साधन विस्तृत हुए, परंतु गुरु शिष्य परंपरा का मूल भाव आज भी प्रासंगिक है। आज भले ही शिष्य विद्यालय या विश्वविद्यालय में पढ़ता हो, फिर भी एक सच्चे शिक्षक का मार्गदर्शन उसके जीवन की दिशा बदल सकता है। यदि गुरु केवल पाठ्यक्रम तक सीमित न रहकर चरित्र निर्माण पर भी ध्यान दे और शिष्य श्रद्धा, परिश्रम और अनुशासन को अपनाए, तो यह परंपरा आधुनिक युग में भी उतनी ही प्रभावशाली सिद्ध हो सकती है। गुरु शिष्य परंपरा हमें यह सिखाती है कि ज्ञान का वास्तविक उद्देश्य आत्मविकास और समाज कल्याण है। यह परंपरा केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए प्रेरणा स्रोत है, क्योंकि जब तक ज्ञान और संस्कार का आदान प्रदान चलता रहेगा, तब तक गुरु शिष्य परंपरा की ज्योति प्रज्वलित रहेगी। इस अवसर पर महंत कमलेशानंद सरस्वती महाराज महंत सूरज दासमहाराज महंत सीताराम दास महाराज महंत हरिदास महाराज महंत प्रेमदास महाराज सहित भारी संख्या में संत महापुरुष तथा भक्तगण उपस्थित थे सभी ने महंताई चादर विधि में हरिद्वार के अने को आश्रम मठ मंदिरों से आये संत महापुरुषों ने भाग लिया तथा आयोजित विशाल भंडारे में भोजन प्रसाद ग्रहण किया।

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