दूधाधारी सप्त ऋषि आश्रम हनुमान मंदिर में भक्तजनों के बीच ज्ञान की अमृत वर्षा करते हुए श्री महंत जय रामदास महाराज

अजय वर्मा, अश्वनी वर्मा

हरिद्वार। वाणी का विषय नहीं बल्कि आत्मा के रूपांतरण की एक संपूर्ण प्रक्रिया है। शास्त्रों में कहा गया है कि ‘रा’ शब्द के उच्चारण से मुख खुलता है जिससे हमारे भीतर के सारे पाप और नकारात्मक विचार बाहर निकल जाते हैं और ‘म’ के उच्चारण के साथ ही मुख बंद हो जाता है जो उस बाहरी अशुद्धि को पुनः भीतर प्रवेश करने से रोकता है। यही वह युक्ति है जो मनुष्य के अंतःकरण को निरंतर पवित्र करती रहती है और जब मन शुद्ध होता है तभी जीवन की सार्थकता का उदय होता है। राम नाम की शक्ति का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि यह नाम स्वयं श्री राम से भी बड़ा माना गया है क्योंकि उनके नाम के आश्रय मात्र से पत्थर भी समुद्र पर तैर गए थे। मनुष्य जीवन की सार्थकता इस बात में नहीं है कि उसने कितनी भौतिक संपदा अर्जित की बल्कि इस बात में है कि उसने अपने भीतर के ‘राम’ यानी उस आत्मिक आनंद और मर्यादा को कितना पहचाना है। जब कोई व्यक्ति निस्वार्थ भाव से इस नाम का सुमिरन करता है तो उसके भीतर से काम, क्रोध, लोभ और मोह जैसे विकारों का स्वतः ही शमन होने लगता है और वह व्यक्ति सांसारिक मोह-माया के बंधनों से कटकर परम शांति का अनुभव करने लगता है। यही वह मार्ग है जिसे हमारे ऋषियों और संतों ने मुक्ति का सरलतम मार्ग बताया है क्योंकि इसमें किसी कठिन तपस्या की आवश्यकता नहीं बल्कि केवल अनन्य प्रेम और अटूट विश्वास की आवश्यकता होती है। राम का नाम वह सेतु है जो इस नश्वर संसार और शाश्वत परमात्मा के बीच की दूरी को मिटा देता है और जीव को जन्म-मरण के चक्र से मुक्त कर उस परम पद तक पहुँचा देता है जहाँ केवल आनंद ही आनंद शेष रहता है। इस नाम की महिमा का गान करते हुए तुलसीदास जी ने भी कहा है कि राम नाम की मणिक दीपक की लौ को अगर जीभ की देहरी पर रख लिया जाए तो भीतर और बाहर दोनों ओर प्रकाश ही प्रकाश हो जाता है जो जीवन को धन्य करने के लिए पर्याप्त है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!