स्वामी श्री हसदेवाचार्य महाराज का संपूर्ण जीवन तप त्याग और साधना को समर्पित था : स्वामी अरुण दास महाराज

अजय वर्मा, अश्वनी वर्मा

हरिद्वार। देश के प्रबुद्ध संतों की गौरवशाली परंपरा में स्वामी श्री हंसदेवाचार्य जी महाराज का स्थान अत्यंत ऊँचा और वंदनीय रहा है। वे ज्ञान के ऐसे विराट सूर्य थे, जिनकी किरणों ने असंख्य जिज्ञासु आत्माओं के अज्ञान रूपी अंधकार को दूर कर उन्हें सत्य, धर्म और आत्मबोध के मार्ग पर अग्रसर किया। उनका संपूर्ण जीवन तप, साधना, त्याग और लोककल्याण को समर्पित रहा। वे जहाँ भी रहे, वहाँ शांति, सद्भाव और आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार स्वतः हो जाता था। आज भले ही वे सशरीर हमारे मध्य न हों, किंतु उनके दिव्य विचार, उनके उपदेश और उनका आशीर्वाद आज भी भक्तजनों के हृदयों में जीवंत रूप से विद्यमान है और आश्रम की पावन भूमि पर सुख, शांति एवं समृद्धि के रूप में प्रतिफलित हो रहा है। प्रातः स्मरणीय स्वामी श्री हंस देवाचार्य जी महाराज की पावन स्मृति में आयोजित श्रीरामचरितमानस पाठ ने संपूर्ण वातावरण को भक्ति और करुणा से सराबोर कर दिया, जहाँ राम नाम की अविरल धारा ने उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति के मन को भाव-विभोर कर दिया। इसके पश्चात महामंडलेश्वर स्वामी श्री अरुण दास जी महाराज के पावन सान्निध्य में श्री स्वामी जगन्नाथ धाम ट्रस्ट, भीमगोड़ा हरिद्वार में आयोजित विशाल संत भंडारे ने सेवा और समर्पण की जीवंत मिसाल प्रस्तुत की। इस दिव्य अवसर पर पधारे अनेक संत-महापुरुषों ने भावुक कंठ से स्वामी श्री हंस देवाचार्य जी महाराज की महिमा का गुणगान किया और उनके आदर्शों को आत्मसात करने का आह्वान किया। स्वामी श्री अरुण दास जी महाराज को भी उनके पदचिन्हों का अनुसरण कर समाज को आध्यात्मिक दिशा प्रदान करने की प्रेरणा दी गई। हजारों की संख्या में उपस्थित संतों और भक्तों की उपस्थिति ने इस आयोजन को एक महाकुंभ सा स्वरूप प्रदान कर दिया, जहाँ सेवा, श्रद्धा और भक्ति का अद्भुत संगम देखने को मिला। यह आयोजन न केवल एक स्मृति समारोह था, बल्कि यह इस सत्य का जीवंत प्रमाण था कि महापुरुष देह से विदा हो जाते हैं, परंतु उनकी चेतना, उनका संदेश और उनकी कृपा युगों-युगों तक मानव समाज को आलोकित करती रहती है। इस अवसर पर बोलते हुए महामंडलेश्वर स्वामी अरुण दास महाराज ने कहा परम पूज्य गुरु भगवान स्वामी श्री हंस देवाचार्य जी महाराज इस पृथ्वी लोक पर तब त्याग और साधना की अखंड मूर्ति थे उनके ज्ञान का प्रताप सदैव हम लोगों के मन मस्तिष्क में उनकी दी गई शिक्षाओं के रूप में बसा रहेगा।

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