अजय वर्मा, अश्वनी वर्मा
हरिद्वार। खड़खड़ी स्थित छायानंद स्कूल हिल बाईपास रोड खड़खड़ी में मां सरस्वती पूजन महोत्सव बड़े ही धूमधाम हर्षोल्लास के साथ संपन्न हुआ इस अवसर पर बोलते हुए संगठन के नवयुवक संघ कमेटी के अध्यक्ष श्री रामा नुज पांडे ने कहामाता सरस्वती ज्ञान, बुद्धि, विवेक, वाणी, संगीत और कला की अधिष्ठात्री देवी मानी जाती हैं। भारतीय संस्कृति में उनका स्थान अत्यंत पवित्र और विशिष्ट है। श्वेत वस्त्र धारण किए, हाथों में वीणा, पुस्तक और माला लिए माता सरस्वती शुद्धता, सात्त्विकता और ज्ञान के प्रकाश का प्रतीक हैं। उनकी आराधना से अज्ञान का अंधकार दूर होता है और जीवन में विवेक, संस्कार तथा सृजनशीलता का विकास होता है। इसलिए विद्यार्थियों, शिक्षकों, विद्वानों, कलाकारों और साहित्यकारों के लिए माता सरस्वती की पूजा विशेष महत्व रखती है।माता सरस्वती की पूजा प्राचीन काल से चली आ रही है। वेदों, उपनिषदों और पुराणों में उनका उल्लेख मिलता है। माना जाता है कि सृष्टि की रचना के समय जब ब्रह्मा जी ने सृजन किया, तब उसे सार्थक रूप देने के लिए ज्ञान और वाणी की आवश्यकता हुई, तब माता सरस्वती का प्राकट्य हुआ। इसी कारण उन्हें विद्या की जननी कहा गया। उनकी कृपा से मनुष्य में सीखने की क्षमता, विचारों की स्पष्टता और अभिव्यक्ति की शक्ति आती है।माता सरस्वती की पूजा विशेष रूप से वसंत पंचमी के दिन की जाती है। यह दिन ऋतुराज वसंत के आगमन का प्रतीक होता है, जब प्रकृति में नवजीवन, उल्लास और सौंदर्य दिखाई देता है। पीले वस्त्र, पीले फूल और पीले प्रसाद के माध्यम से माता की आराधना की जाती है। इस दिन विद्यालयों, महाविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों में विशेष पूजा होती है और छोटे बच्चों को अक्षर ज्ञान का शुभारंभ कराया जाता है, जिसे विद्यारंभ संस्कार कहा जाता है। श्री विक्की पांडे ने कहा
पूर्वांचल के क्षेत्र में माता सरस्वती की पूजा का विशेष और जीवंत स्वरूप देखने को मिलता है। उत्तर प्रदेश और बिहार के पूर्वांचल अंचल में यह पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सांस्कृतिक उत्सव के रूप में मनाया जाता है। सचिव रणजीत पांडे ने कहा हमारे यहां गांव-गांव, मोहल्लों और शिक्षण संस्थानों में भव्य पंडाल सजाए जाते हैं, जहां विधि-विधान से माता सरस्वती की प्रतिमा स्थापित की जाती है। श्रद्धालु पूरे मनोयोग से पूजा-अर्चना करते हैं और ज्ञान की प्राप्ति की कामना करते हैं। पप्पू पांडे महामंत्री ने कहा
पूर्वांचल में माता सरस्वती की पूजा का विद्यार्थियों से गहरा संबंध है। बच्चे और युवा अपनी पुस्तकों, कलम और वाद्य यंत्रों को माता के चरणों में रखकर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। यह विश्वास किया जाता है कि माता की कृपा से पढ़ाई में एकाग्रता बढ़ती है, परीक्षा में सफलता मिलती है और जीवन में सही मार्ग का चयन होता है। इसी कारण इस क्षेत्र में माता सरस्वती को अत्यंत स्नेह और श्रद्धा के साथ “माँ” कहकर पुकारा जाता है।यहां की पूजा में भक्ति के साथ-साथ लोक संस्कृति की सुंदर झलक भी देखने को मिलती है। भजन, कीर्तन, लोकगीत और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से माता की महिमा का गुणगान किया जाता है। युवाओं में विशेष उत्साह दिखाई देता है, जो पूरे अनुशासन और पवित्रता के साथ पूजा आयोजन में सहभागी बनते हैं। पूजा के बाद प्रसाद वितरण और सामूहिक भंडारे का आयोजन सामाजिक एकता और भाईचारे को मजबूत करता हैपूर्वांचल में विसर्जन की परंपरा भी अत्यंत भावनात्मक होती है। श्रद्धालु नम आंखों से माता को विदा करते हैं और अगले वर्ष पुनः आगमन की कामना करते हैं। यह विदाई केवल एक मूर्ति के विसर्जन तक सीमित नहीं रहती, बल्कि ज्ञान, संस्कार और सद्भाव को जीवन में उतारने का संकल्प भी साथ लेकर आती है। श्री वरुण उपाध्याय ने कहा
कुल मिलाकर माता सरस्वती की पूजा आराधना भारतीय संस्कृति में ज्ञान और संस्कार की साधना का प्रतीक है। पूर्वांचल के लोगों की आस्था, श्रद्धा और उत्साह इस पूजा को और भी विशेष बना देता है। यहां माता सरस्वती केवल विद्या की देवी नहीं, बल्कि जीवन को सही दिशा देने वाली करुणामयी माँ के रूप में पूजी जाती हैं, जिनकी कृपा से समाज में शिक्षा, संस्कृति और नैतिक मूल्यों का सतत विकास होता है। इस अवसर पर यज्ञ के साथ-साथ निशुल्क उपनयन संस्कार की व्यवस्था भी की गई थी इस अवसर पर गौरव उपाध्याय मुकेश पांडे सोनू पांडे पंकज पांडे श्री कैलाश पांडे सहित भारी संख्या में पूर्वांचल के लोग तथा स्थानीय लोग उपस्थित थे।
