मां काली का स्वरूप संहार के साथ-साथ अनंत वात्सल्य का भी प्रतीक है : महंत रजनी गिरी महाराज

अजय वर्मा, अश्वनी वर्मा

हरिद्वार। कांगड़ी स्थित श्री मां काली देवी शक्तिपीठ आश्रम श्यामपुर कांगड़ी में 22 जनवरी 2026 से 23 जनवरी 2026 तक विशाल मां भगवती जागरण के साथ-साथ संत समागम तथा विशाल भंडारे का आयोजन किया गया इस अवसर पर बोलते हुए आश्रम की श्री महंत रजनी गिरी महाराज ने कहाजय माँ काली! माँ भगवती के चरणों में सादर नमन।

माँ काली का स्वरूप केवल संहार का प्रतीक नहीं है, बल्कि वह अनंत वात्सल्य और सुरक्षा की पराकाष्ठा हैं। एक भक्त के लिए माँ काली वह चेतना है जो अंधकार को चीरकर प्रकाश की ओर ले जाती है।

यहाँ माँ भगवती, महाकाली और माँ दुर्गा के दिव्य स्वरूपों का वर्णन करते हुए एक भावपूर्ण लेख और उनके चरणों में अर्पित एक भजन प्रस्तुत है।

माँ काली: ममता और शक्ति का अनंत सागर

अध्यात्म की गहराई में माँ काली को ‘आद्या’ कहा गया है, यानी वह शक्ति जो सृष्टि के निर्माण से पहले भी थी और प्रलय के बाद भी रहेगी। उनका काला रंग शून्यता का प्रतीक है, जिसमें ब्रह्मांड की सारी ऊर्जा समाहित हो जाती है।

माँ के विविध स्वरूप: एक ही चेतना के अनेक रूप

भक्त जब माँ को पुकारता है, तो वह विभिन्न रूपों में दर्शन देती हैं:

* माँ दुर्गा (अभेद्य शक्ति): जब संसार आसुरी शक्तियों के भार से दब जाता है, तब माँ दुर्गा के रूप में वे सिंहवाहिनी बनकर आती हैं। उनके हाथों के अस्त्र-शस्त्र हमें सिखाते हैं कि अधर्म के विरुद्ध साहस ही सबसे बड़ा धर्म है।

माँ महाकाली (काल की स्वामिनी): महाकाली वह रूप है जो समय (काल) को भी अपने वश में रखती हैं। उनका विकराल रूप केवल दुष्टों के लिए है; भक्तों के लिए तो वे ‘दक्षिणकाली’ हैं, जिनका दाहिना पैर आगे बढ़कर आशीर्वाद प्रदान करता है।

माँ भगवती (करुणामयी जननी): वह जगदम्बा हैं। जैसे एक माँ अपने बच्चे के हर अपराध को क्षमा कर उसे गले लगा लेती है, वैसे ही भगवती अपने शरणागत भक्त के सारे पाप धोकर उसे मोक्ष प्रदान करती हैं।

भक्तों पर अपार कृपा

माँ काली की कृपा का अनुभव वह भक्त कर सकता है जिसने अपना अहंकार उनके चरणों में त्याग दिया हो। माँ केवल रक्तबीज जैसे राक्षसों का वध नहीं करतीं, बल्कि हमारे भीतर छिपे काम, क्रोध, लोभ और मोह रूपी राक्षसों का भी संहार करती हैं। उनकी कृपा से असंभव भी संभव हो जाता है और भक्त का हृदय निर्भय हो जाता है।

विशेष भेंट: भक्तिमय भजन

(इसे आप माँ की चौकी या ध्यान के समय भावपूर्ण स्वर में गा सकते हैं)

मुखड़ा:

ओ मैया काली, ओ मैया शेरोंवाली,

तेरी कृपा की छाया में, दुनिया है मतवाली।

तू ही है दुर्गा, तू ही भवानी, तू ही महाकाली,

भर दे माँ सबके सूने जीवन की तू खाली झोली खाली॥

अंतरा 1:

विकराल रूप तेरा, दुष्टों को थर्राए,

पर भक्त जो आए द्वारे, ममता की छांव पाए।

हाथ में खप्पर सोहे, गले मुण्डों की माला,

मिटा दे मैया मेरे, मन का ये अंधियारा काला॥

अंतरा 2:

तूने ही तारा जग को, तूने ही संकट टाले,

शरण में तेरी आए, किस्मत के जो मारे।

कभी दुर्गा बनके आना, कभी काली बनके आना,

मेरे हृदय के मन्दिर में, माँ ज्योत जगा के जाना॥

सदा जय हो माँ की!

साधना का सार

माँ काली की कृपा प्राप्त करने का सबसे सरल मार्ग है—पूर्ण समर्पण। जब हम यह मान लेते हैं कि “मैं कुछ नहीं हूँ, जो है वह माँ है”, तभी माँ का अभय हस्त हमारे सिर पर होता है। उनकी कृपा से जीवन के सारे ‘काले बादल’ छँट जाते हैं और भक्ति का नया सूर्य उदय होता है।

जय माँ महाकाली! जय माता दी! इस अवसर पर बोलते हुए महंत स्वामी रचित गिरी महाराज ने कहा जिस पर मां भगवती मां दुर्गा महाकाली की कृपा हो जाएं उसका मानव जीवन धन्य तथा सार्थक हो जाता है माता की सूक्ष्म आराधना से भक्तों को मनोवांछित फल प्राप्त होते हैं स्वामी योगानंद ब्रह्मचारीमहाराज ने कहा भक्ति जिस क्षण मनुष्य के जीवन में प्रवेश कर जाती है उसी क्षण से उसका मानव जीवन धन्य तथा सार्थक हो जाता है इस अवसर पर महंत विष्णु गिरी महाराज महंत मस्त गिरी महाराज महंत ग्वाला पुरी महाराज महेंद्र प्रेम तीर्थ महाराज स्वामी अनिरुद्धआचार्य महाराज श्री सूर्य जी कुशलमुकेशमहंतमोहन सिंह महाराज प्रशांतकोतवाल कमल मुनि महाराज सहित भारी संख्या मेंसंत महापुरुषतथा भक्तगण उपस्थित थे।

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