अजय वर्मा, अश्वनी वर्मा
हरिद्वार। कनखल स्थित श्री पंचायती निर्मल अखाड़े में मकर संक्रांति पर्व बड़े ही धूमधाम से मनाया गया इस अवसर पर बोलते हुए प्रातः स्मरणीय श्री महेंद्र स्वामी ज्ञान देव सिंह जी महाराज ने कहामकर संक्रांति भारत का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और प्राचीन त्योहार है, जिसे पूरे देश में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। यह त्योहार हर साल 14 या 15 जनवरी को आता है और इसे सूर्य भगवान के मकर राशि में प्रवेश करने के अवसर पर मनाया जाता है। इसे सूर्य के उत्तरायण में प्रवेश का दिन भी कहा जाता है, क्योंकि इस दिन से सूर्य अपनी उत्तरायण यात्रा शुरू करते हैं। हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार उत्तरायण का समय अत्यंत शुभ और पवित्र माना जाता है। इस दिन सूर्य देवता को अर्घ्य देने और उनका पूजन करने से जीवन में सुख, समृद्धि और स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है|मकर संक्रांति का धार्मिक महत्व प्राचीन हिंदू ग्रंथों में विस्तार से वर्णित है। कहा जाता है कि इस दिन सूर्य देवता का उत्तरायण आरंभ होता है, जो अंधकार और पापों से मुक्ति का प्रतीक है। पौराणिक कथाओं के अनुसार पितरों की आत्मा को इस दिन मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसी कारण से इस दिन तिल और गुड़ से बने व्यंजन, जैसे तिल के लड्डू और गुड़, बनाकर अपने रिश्तेदारों और मित्रों में बांटना बहुत शुभ माना जाता है। कहा जाता है कि तिल और गुड़ से स्वास्थ्य, शक्ति और सौभाग्य बढ़ता है।मकर संक्रांति पर पवित्र नदियों में स्नान करना अत्यंत पुण्यदायक माना जाता है। गंगा, यमुना और अन्य पवित्र नदियों में स्नान करने से शरीर और मन से पाप दूर होते हैं। इस अवसर पर बोलते हुए कोठारी महंत जसविंदर सिंह महाराज ने कहा मकर संक्रांति के दिन दान-पुण्य करना भी बहुत ही शुभ माना जाता है। गरीबों और जरूरतमंदों को अनाज, कपड़े और धन दान करने से व्यक्ति को धार्मिक और आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होता है।सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व:मकर संक्रांति केवल धार्मिक पर्व नहीं है, बल्कि यह सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस दिन लोग अपने घरों और आस-पास के क्षेत्रों में पतंगबाजी करते हैं। आसमान में रंग-बिरंगी पतंगों का दृश्य त्योहार को और भी रोचक और आनंदमय बनाता है। बच्चे और बड़े मिलकर पतंग उड़ाते हैं, मिठाइयाँ बाँटते हैं और एक-दूसरे के साथ खुशियाँ मनाते हैं। यह पर्व लोगों में भाईचारे, प्रेम और सौहार्द्र की भावना को भी बढ़ाता है।मकर संक्रांति का पर्व मुख्यतः कृषि प्रधान समाज के लिए भी महत्वपूर्ण है। यह फसल कटाई के मौसम का प्रतीक है। किसान अपनी मेहनत के फलों का आनंद लेते हैं और नए कृषि वर्ष की शुरुआत इस दिन करते हैं। इसलिए इसे “फसल उत्सव” के रूप में भी जाना जाता है। इस दिन नए धान, गेहूं और अन्य फसलों का स्वागत किया जाता है और खेतों में हल चलाने की रस्में भी की जाती हैं।
मकरसंक्रांतिहमेंजीवनमेंसकारात्मकता, नवीनता,खुशहाली और समृद्धि की सीख देती है। यह हमें यह सिखाती है कि मेहनत का फल निश्चित रूप से मिलता है, और अंधकार के बाद उजाला आता है। इस दिन का पर्व हमें अपने धर्म, संस्कृति और परंपराओं से जोड़ता है और समाज में मेल-जोल, प्रेम और भाईचारे को बढ़ावा देता है।
इस प्रकार, मकर संक्रांति न केवल एक धार्मिक उत्सव है, बल्कि यह हमारे जीवन में शुभता, स्वास्थ्य, खुशहाली, आध्यात्मिक उन्नति और सामाजिक सौहार्द्र का संदेश लेकर आती है। इसे बड़े उत्साह और हर्षोल्लास के साथ मनाना हमारी भारतीय परंपरा और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। इस अवसर पर एक विशाल संत भक्त भंडारे का आयोजन किया गया इस अवसर पर कोठारी महंत जसविंदर सिंह महाराज संत ज्ञानी गगनदीप सिंह महाराज संत निर्भय सिंह महाराज संत खेम सिंह महाराज संत सुखमल सिंह महाराज संत करण सिंह महाराज संत बाबा प्रीत सिंह महाराज संत जसकरण सिंह महाराज संत वीर सिंह महाराज बाबा अंकित सिंह महाराज सहित भारी संख्या में संत महापुरुष तथा भक्तजन उपस्थित थे।
