अजय वर्मा, अश्वनी वर्मा
हरिद्वार। सिद्ध श्री अमीर गिरी धाम हरिपुर में परम पूज्य गुरुदेव ब्रह्मलीन श्री महंत प्रातः स्मरणीय गुरु भगवान विनोद गिरि जी महाराज की पावन पुण्यतिथि आश्रम में संत महापुरुषों की गरिमा में उपस्थित के बीच बड़े ही धूमधाम हर्षोल्लास के साथ मनाई गई इस अवसर पर एक विशाल संत समागम को संबोधित करते हुए जूना अखाड़े के पूर्व सचिव श्री महंत देवानंद सरस्वती महाराज ने कहायह बहुत ही सुंदर और सात्विक विचार है। भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान ईश्वर से भी ऊपर माना गया है क्योंकि गुरु ही वह माध्यम है जो हमें उस परम तत्व (हरि) तक पहुँचाने की दृष्टि प्रदान करता है।यहाँ आपकी भावनाओं के अनुरूप गुरु की महिमा है: इस पृथ्वी लोक पर गुरुदेव ही ऐसे देव हैं जो धर्म-कर्म के माध्यम से सीधे ईश्वर से साक्षात्कार करा देते है गुरु महिमा: ज्ञान का सूर्य और कल्याण की पावन निधिभारतीय आध्यात्मिक परंपरा में गुरु मात्र एक शिक्षक नहीं, बल्कि साक्षात चैतन्य की प्रतिमूर्ति होते हैं। जिस प्रकार सूर्य के उदित होते ही अंधकार स्वतः समाप्त हो जाता है और चराचर जगत में नव-जीवन का संचार होता है, उसी प्रकार गुरु के ज्ञान का प्रकाश शिष्य के हृदय में सोए हुए विवेक को जागृत कर देता है।ज्ञान के सूर्य: गुरु का तेज
शास्त्रों में कहा गया है— “गु” का अर्थ है अंधकार और “रु” का अर्थ है प्रकाश। गुरु वह तत्व है जो अज्ञान रूपी अंधकार को मिटाकर ज्ञान का दिव्य प्रकाश फैलाता है। गुरु की वाणी में वह ओज होता है जो बुद्धि की जड़ता को काट देता है। इस अवसर पर बोलते हुए महामंडलेश्वर 1008 प्रातः स्मरणीय परम पूज्य राधा गिरी जी महाराज ने कहाशिष्य गुरु के सानिध्य में आता है, तो उसके भीतर के संशय, भ्रम और भय वैसे ही जलकर भस्म हो जाते हैं जैसे सूर्य की किरणों से पाला (ओस) लुप्त हो जाता है। कल्याण का मार्ग और पावननिधिगुरु केवल अक्षर ज्ञान नहीं देते, बल्कि वे कल्याण का मार्ग प्रशस्त करते हैं। वे एक ‘पावन निधि’ यानी पवित्र खजाने के समान हैं। इस खजाने में शांति, संतोष, क्षमा और परोपकार जैसे अनमोल रत्न होते हैं। संसार की तमाम संपत्तियां बाहरी सुख दे सकती हैं, लेकिन आंतरिक आनंद और आत्मा का कल्याण केवल गुरु की कृपा से ही संभव है। वे जानते हैं कि किस शिष्य को किस विधि से सुधारना है, ठीक वैसे ही जैसे एक कुम्हार घड़े को बाहर से चोट मारता है पर भीतर से सहारा देकर उसे सुंदर आकार देता है। गुरु सानिध्य और हरि शरणागतिजीवन का परम लक्ष्य है भगवान हरि की शरणागति। परंतु माया के वश में होकर जीव इस लक्ष्य को भूल जाता है। गुरु का सानिध्य वह सुरक्षा कवच है जो भक्त को सांसारिक मोह-माया से बचाकर प्रभु के चरणों की ओर मोड़ देता है।दृष्टि का परिवर्तन: गुरु हमारी दृष्टि बदल देते हैं। जहाँ पहले हमें संसार ही सत्य दिखता था, गुरु की कृपा से हमें कण-कण में नारायण के दर्शन होने लगते हैं।
अहंकार का विसर्जन: हरि की शरण में जाने के लिए ‘अहंकार’ का त्याग अनिवार्य है। गुरु शिष्य की ‘मैं’ को मारकर उसे ‘हरि’ से जोड़ देते हैं।सहज भक्ति: जिनके जीवन में गुरु का हाथ होता है, उन्हें कठिन तपस्या की आवश्यकता नहीं पड़ती। गुरु का आशीर्वाद ही उन्हें भवसागर से पार उतारने वाली नौका बन जाता है।गुरु-शिष्य संबंध की दिव्यताजिस भक्त के जीवन में गुरु का पदार्पण हो गया, समझिए उस पर ईश्वर की असीम कृपा हो गई। गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी कहा है कि गुरु के चरणों की रज (धूल) दिव्य अंजन के समान है, जिसे आंखों में लगाने से विवेक के नेत्र खुल जाते हैं। गुरु ही वह सेतु है जिसके माध्यम से जीवात्मा, परमात्मा से मिलन का सुख प्राप्त करती है। गुरु से बड़ा और सच्चा मार्गदर्शन जीवन में मनुष्य को कोई और प्राप्त हो ही नहीं सकता ईश्वर तक उंगली पड़कर गुरु हमारा मार्गदर्शन करते हैं हमारा लोक एवं परलोक दोनों सुधार देते गुरु हमारे लिए अंधकार में प्रकाश के सामान गुरु की कृपा और मार्गदर्शन हमारे मानव जीवन को सार्थक करने के साथ-साथ धन्य कर देता है इस अवसर पर महंत अन्नपूर्णागिरी महंत केशवानंद महाराज महंत कन्हैया दास महंत जमनादास सहित भारी संख्या में संत महापुरुष उपस्थित थे सभी ने आयोजित विशाल भंडारे में भोजन प्रसाद ग्रहण किया तथा परम पूज्य ब्रह्मलीन श्री महंत विनोद गिरि जी महाराज जी महाराज को अपने श्रद्धा सुमन अर्पित किये।
