अजय वर्मा, अश्वनी वर्मा
हरिद्वार। पीपल वाली गली स्थित श्री राम कृपा धाम आश्रम में आयोजित सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा का सातवां दिन श्रद्धा, भक्ति और भावनाओं से ओतप्रोत रहा। कथा के अंतिम दिवस कथा व्यास साध्वी डॉ. विश्वेश्वरी देवी जी ने भगवान श्रीकृष्ण के विवाह प्रसंग, सुदामा चरित्र एवं परीक्षित मोक्ष का दिव्य वर्णन करते हुए भक्तों को धर्म, प्रेम, मित्रता और भक्ति का संदेश दिया।
कथा विश्राम के अवसर पर संपूर्ण पंडाल में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ रही और पुष्पों की होली के साथ वातावरण आनंदमय हो उठा। कथा के दौरान भगवान श्रीकृष्ण के 16,108 विवाहों का प्रसंग सुनाया गया। कथा व्यास ने बताया कि भगवान श्रीकृष्ण की पत्नियों के स्वरूप में 16 हजार वेद-उपनिषद तथा आठ प्रकृतियों का आध्यात्मिक स्वरूप माना गया है। इस प्रसंग के माध्यम से श्रद्धालुओं को भगवान की व्यापकता और दिव्य स्वरूप का संदेश दिया गया। इसके पश्चात सुदामा चरित्र का भावपूर्ण वर्णन करते हुए साध्वी डॉ. विश्वेश्वरी देवी ने कहा कि सच्ची मित्रता में छोटा-बड़ा, अमीर-गरीब अथवा ऊंच-नीच का कोई भेद नहीं होता। मित्रता में केवल भावों की पवित्रता और प्रेम का महत्व होता है। भगवान श्रीकृष्ण ने अपने बालसखा सुदामा के निष्कपट प्रेम और पवित्र भाव को पहचानकर उन्हें अत्यंत सम्मान दिया। भगवान ने स्वयं सुदामा के चरण धोकर मित्रता की मर्यादा को संसार के सामने स्थापित किया। सुदामा ने अपने मित्र से किसी प्रकार की सहायता नहीं मांगी, लेकिन भगवान ने उनके मन की स्थिति को जानकर बिना कुछ कहे उन्हें अपार वैभव प्रदान किया। सुदामा की निर्धन कुटिया का भव्य महल में परिवर्तित होना भगवान की कृपा और निष्काम मित्रता का अनुपम उदाहरण है। कथा व्यास ने कहा कि भगवान को दिखावे की नहीं, बल्कि भक्त के निर्मल भाव की आवश्यकता होती है। सुदामा ने कुछ मांगा नहीं, फिर भी भगवान ने उन्हें सब कुछ प्रदान कर दिया।
यही श्रीमद्भागवत का संदेश है कि जहां प्रेम और भक्ति सच्ची होती है, वहां भगवान स्वयं भक्त के जीवन में सुख-समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करते हैं। इसके साथ ही परीक्षित मोक्ष का दिव्य प्रसंग सुनाया गया। भगवान की भक्ति एवं श्रीमद्भागवत श्रवण की महिमा का वर्णन करते हुए कथा व्यास ने श्रद्धालुओं को जीवन में धर्म, सदाचार, सेवा और प्रभु स्मरण को अपनाने का संदेश दिया। परीक्षित मोक्ष के प्रसंग से श्रद्धालु भावविभोर हो उठे। कथा के समापन अवसर पर संतों, श्रद्धालुओं और भक्तजनों पर पुष्प वर्षा की गई तथा पुष्पों की होली खेली गई। पुष्पों की रंग-बिरंगी वर्षा के बीच पूरा पंडाल ‘राधे-राधे’ और ‘जय श्रीकृष्ण’ के जयघोष से गूंज उठा। श्रद्धालु भक्ति में झूमते नजर आए और वातावरण पूरी तरह कृष्णमय हो गया।
