अंतरराष्ट्रीय शांति दिवस पर परमार्थ निकेतन से शांति का शाश्वत संदेश

अजय वर्मा, अश्वनी वर्मा

ऋषिकेश। अंतरराष्ट्रीय शांति दिवस के पावन अवसर पर परमार्थ निकेतन में स्पेन, ऑस्ट्रेलिया सहित विश्व के अनेक देशों से भारत की सनातन आध्यात्मिक संस्कृति, योग, ध्यान और गंगा के दिव्य सान्निध्य का अनुभव करने आए श्रद्धालुओं ने परमार्थ पीठाधीश्वर, पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी से भेंट कर अपनी जिज्ञासाओं का समाधान प्राप्त किया। पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने अंतरराष्ट्रीय शांति दिवस के अवसर पर शांति की वास्तविक प्रकृति पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मनुष्य सदियों से शांति की खोज कर रहा है। हम शांति की कामना करते हैं, उसके लिए प्रार्थना करते हैं, शांति की बातें करते हैं, राष्ट्रों और समाजों के बीच शांति स्थापित करने के प्रयास करते हैं, फिर भी प्रश्न यह है कि शांति इतनी कठिन क्यों प्रतीत होती है? पूज्य स्वामी जी ने कहा कि शांति बाहर से प्राप्त की जाने वाली कोई वस्तु नहीं, बल्कि भीतर से प्रकट होने वाली अवस्था है। जब तक हमारे भीतर द्वेष, अहंकार, असंतोष, भय और विभाजन की वृत्तियाँ सक्रिय हैं, तब तक बाहरी परिस्थितियाँ कितनी ही अनुकूल क्यों न हों, अंतःकरण में वास्तविक शांति स्थापित नहीं हो सकती। शांति का आरम्भ संसार को बदलने से पहले स्वयं के भीतर उतरने से होता है। उन्होंने कहा कि हम प्रायः शांति को परिस्थितियों से जोड़ देते हैं, जब सब कुछ हमारी इच्छा के अनुसार होगा, तब हम शांत होंगे; जब कोई हमें समझेगा, तब हम शांत होंगे; जब संसार बदल जाएगा, तब हमें शांति मिलेगी। परंतु शांति परिस्थितियों की दासी नहीं, चेतना की अवस्था है। पूज्य स्वामी जी ने कहा आज विश्व को केवल सीमाओं पर युद्धों की समाप्ति की नहीं, बल्कि हृदयों में युद्ध की समाप्ति की आवश्यकता है। बाहरी संघर्षों की जड़ अक्सर भीतर के संघर्षों में होती है। अतः विश्व शांति की यात्रा आत्मशांति से प्रारम्भ होती है। योग, ध्यान, प्रार्थना, सेवा, करुणा और आत्मचिंतन मनुष्य को अपने भीतर स्थित शाश्वत शांति से जोड़ने के साधन हैं। पूज्य स्वामी जी ने कहा कि भारत की सनातन परंपरा ने सदैव समस्त विश्व को शांति का संदेश दिया है “सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।” यह केवल एक प्रार्थना नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के कल्याण की जीवन-दृष्टि है। हमारी प्रार्थना केवल ‘मैं’ तक सीमित नहीं होती; वह ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना से सम्पूर्ण सृष्टि के सुख और मंगल की कामना करती है।परमार्थ निकेतन में देश-विदेश से आए श्रद्धालुओं ने माँ गंगा के पावन तट पर विश्व शांति, मानवता की एकता, प्रकृति संरक्षण और मंगल के लिए प्रार्थना की। विभिन्न देशों, संस्कृतियों और भाषाओं से आए साधकों का एक साथ गंगा तट पर बैठना स्वयं उस शाश्वत संदेश का प्रतीक है जहां भाषाएँ भिन्न हो सकती हैं, संस्कृतियाँ भिन्न हो सकती हैं, परंतु हृदय की शांति और प्रेम की आकांक्षा सार्वभौमिक है। आइए, शांति की खोज संसार से आरम्भ न करके स्वयं से करें। अपने भीतर के द्वेष को प्रेम में, अशांति को ध्यान में, अहंकार को विनम्रता में और विभाजन को एकत्व में रूपांतरित करें। शांति बाहर खोजने की वस्तु नहीं, शांति हमारे भीतर जगाने वाली चेतना है। आइए, स्वयं में शांति जगाएँ और विश्व में शांति का प्रकाश प्रसारित करें।

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