मानसून की पहली वर्षा के पावन अवसर पर पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी एवं ऋषिकुमारों ने किया पौधारोपण

अजय वर्मा, अश्वनी वर्मा

ऋषिकेश। मानसून की प्रथम वर्षा के समय आज परमार्थ पीठाधीश्वर, पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने ऋषिकुमारों के साथ पौधारोपण कर भारत के हरित भविष्य, प्रकृति के प्रति उत्तरदायित्व और राष्ट्रधर्म के प्रति अटूट प्रतिबद्धता का बीजारोपण किया। भारत की आत्मा उसकी संस्कृति, नदियों, वनों और हरित धरती में बसती है। यदि इनके संरक्षण से हमारा पर्यावरण सुरक्षित होगा, हमारी सभ्यता, हमारी संस्कृति और हमारा राष्ट्रीय स्वाभिमान भी अक्षुण्ण रहेगा। इस अवसर पर पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि प्रकृति का संरक्षण आज केवल पर्यावरणीय विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रधर्म का सर्वाेच्च स्वरूप है। जो समाज अपने जल, जंगल, जमीन और जैव विविधता की रक्षा नहीं कर सकता, वह अपनी सांस्कृतिक पहचान और राष्ट्रीय अस्मिता को भी लंबे समय तक सुरक्षित नहीं रख सकता। उन्होंने कहा कि भारत की सनातन संस्कृति ने सदैव प्रकृति को देवत्व प्रदान किया है। हमारे यहाँ नदियाँ जीवनदायिनी हैं, पर्वत देव तुल्य हैं, वृक्ष पूजनीय हैं और पृथ्वी स्वयं माता है। भारतीय जीवनदृष्टि उपभोग, यूज एंड थ्रो नहीं, बल्कि सहअस्तित्व, संरक्षण और संवर्धन का संदेश देती है। आधुनिक विकास तभी सार्थक है जब वह प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर आगे बढ़े। पूज्य स्वामी जी ने कहा कि आज आवश्यकता केवल पौधे लगाने की नहीं, बल्कि पौधों के साथ अपना रिश्ता पुनः स्थापित करने की है। जब तक प्रत्येक नागरिक पौधों को परिवार के सदस्य की तरह अपनाकर उसका पालन-पोषण नहीं करेगा, तब तक हरियाली का स्वप्न अधूरा रहेगा। पौधारोपण जीवनभर निभाया जाने वाला संकल्प है। उन्होंने कहा कि जंगल केवल लकड़ी का स्रोत नहीं, बल्कि शुद्ध वायु, जल संरक्षण, जैव विविधता और जलवायु संतुलन के आधार हैं। नदियाँ केवल जल का स्रोत नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था, कृषि, संस्कृति और जीवन की धड़कन हैं। भूमि केवल आर्थिक संसाधन नहीं, बल्कि हमारे पूर्वजों का तप, त्याग और आने वाली पीढ़ियों की अमूल्य धरोहर है। यदि हम इनका सम्मान नहीं करेंगे तो विकास का कोई भी मॉडल स्थायी नहीं रह सकता। पूज्य स्वामी जी ने विशेष रूप से युवाओं और बच्चों का आह्वान करते हुए कहा कि भारत का भविष्य केवल तकनीक और अर्थव्यवस्था से नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ हमारे संबंध से तय होगा। यदि नई पीढ़ी पर्यावरण संरक्षण को जीवनशैली बना लेती है तो भारत विश्व को पुनः संतुलित, टिकाऊ और आध्यात्मिक विकास का मार्ग दिखा सकता है। उन्होंने कहा कि आज प्रत्येक परिवार, प्रत्येक विद्यालय, प्रत्येक आश्रम और प्रत्येक संस्था को हर वर्ष पौधारोपण के साथ-साथ पौधों के संरक्षण का संकल्प भी लेना होगा। उन्होंने कहा कि मानसून प्रकृति का उत्सव है। यह हमें याद दिलाता है कि जीवन का प्रत्येक नया आरंभ धरती के प्रति कृतज्ञता से होना चाहिए। वर्षा की प्रत्येक बूंद हमें यह संदेश देती है कि यदि हम प्रकृति का सम्मान करेंगे तो प्रकृति हमें अन्न, जल, स्वास्थ्य और समृद्धि के रूप में अनेक गुना लौटाएगी। पूज्य स्वामी जी ने कहा कि अपने जीवन में कम से कम एक से पांच पौधों को पूर्ण समर्पण के साथ विकसित करे, जल का संरक्षण करे, नदियों को प्रदूषण से मुक्त रखने का प्रयास करे और प्रकृति के प्रति संवेदनशील जीवनशैली अपनाए। यही सच्चा राष्ट्रप्रेम है, यही सनातन संस्कृति का संदेश है और यही आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी भी है।मानसून की पहली वर्षा में परमार्थ निकेतन से हरित चेतना का आह्वान करते हुये पर्यावरण संरक्षण को राष्ट्र निर्माण के महायज्ञ से जोड़ने हेतु स्वामी जी ने युवाओं को प्रेरित किया। राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस पर सभी चिकित्सकों को परमार्थ निकेतन से हार्दिक शुभकामनाएँ देते हुये कहा कि मानव सेवा ही माधव सेवा है, ईश्वर सेवा है और इस पावन साधना के सच्चे अग्रदूत हमारे चिकित्सक हैं। चिकित्सकों का समर्पण, करुणा और सेवा-भाव अनगिनत जीवन में आशा, विश्वास और नवजीवन का संचार करते हैं। चिकित्सक केवल रोगों का उपचार नहीं करते, बल्कि मानवता की रक्षा और जीवन की गरिमा को भी संबल प्रदान करते हैं. उन सभी चिकित्सकों का जीवन सदैव मानव कल्याण का प्रेरक और पथप्रदर्शक बना रहे. आज की परमार्थ गंगा आरती सभी चिकित्सकों के स्वस्थ व दीर्घायुस्य हेतु समर्पित की गयी।

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