स्वरूपानन्द महाराज के पावन सानिध्य में श्री ज्ञान गंगा गौ सेवा ट्रस्ट में संत महापुरुषों का विशाल समागम

अजय वर्मा, अश्वनी वर्मा

हरिद्वार। रानी गली अमेरिकन आश्रम के सामने श्री ज्ञान गंगा गौ सेवा ट्रस्ट का शुभारंभ शुद्धिकरण तथा संत महापुरुषों का पदार्पण कार्यक्रम आश्रम के परमाध्यक्ष प्रातः स्मरणीय गुरु मूर्ति स्वामी ज्ञान स्वरूप आनंद अक्रिय जी महाराज के पावन सानिध्य में संपन्न हुआ इस अवसर पर बोलते हुए स्वामी ज्ञान स्वरूपानन्द अक्रियमहाराज ने कहा इससृष्टि में मनुष्य जीवन अत्यंत दुर्लभ और अमूल्य माना गया है, क्योंकि यही वह अवस्था है जहाँ आत्मा अपने कर्मों के माध्यम से स्वयं को ऊँचा उठा सकती है। इस जीवन की सबसे बड़ी निधि यदि कुछ है तो वह है गाय माता की सेवा, संत महापुरुषों की वंदना, धर्म–कर्म का पालन, पुरुषार्थ का आचरण, दरिद्र नारायण की सहायता और सनातन संस्कृति के उत्थान में अपना योगदान। यह केवल धार्मिक कर्तव्य नहीं, बल्कि आत्मिक उन्नति का मार्ग है जो मनुष्य को भीतर से दिव्य बनाता है। गाय माता भारतीय जीवन पद्धति का आधार रही है; वे केवल एक पशु नहीं, बल्कि पोषण, सहनशीलता और करुणा की मूर्ति मानी गई हैं। उनके चरणों में सेवा करने से मन में दया, त्याग और संतोष के संस्कार जागृत होते हैं। इस अवसर पर बोलते हुए गुरु भगवान प्रातः स्मरणीय स्वामी अलकानन्द अक्रिय महाराज जिस समाज में गौ सेवा का भाव होता है, वहाँ प्रकृति के प्रति सम्मान और संरक्षण की भावना स्वतः विकसित होती है, क्योंकि गाय मातृत्व और प्रकृति के समन्वय का प्रतीक हैं। संत सेवा मनुष्य को आध्यात्मिक ऊँचाइयों तक ले जाती है। इस अवसर पर बोलते हुए स्वामी कमलेशानन्द सरस्वतीमहाराज संत महापुरुष अपने तप, त्याग और साधना से समाज को दिशा देते हैं। उनके श्रीमुख से निकली वाणी केवल शब्द नहीं होती, वह जीवन को बदल देने वाली अमृतधारा होती है। जब कोई मनुष्य संतों के सान्निध्य में बैठता है, तो उसके भीतर का अज्ञान, मोह और अहंकार धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है और वह सत्य के प्रकाश को अनुभव करता है। इस अवसर पर बोलते हुए परम पूज्य स्वामी सत्यव्रतानंद महाराज ने कहाधर्म कर्म और पुरुषार्थ जीवन के चार स्तंभ हैं। धर्म हमें कर्तव्य का बोध कराता है, कर्म हमें सक्रिय रखता है और पुरुषार्थ हमें लक्ष्य की ओर निरंतर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। महंत सूरज दास महाराज ने कहा बिना पुरुषार्थ के जीवन निष्क्रिय हो जाता है, और बिना धर्म के जीवन दिशाहीन। दरिद्र नारायण सेवा सनातन संस्कृति का हृदय है। प्रत्येक जीव में ईश्वर का वास है, इस भावना के साथ जब हम किसी गरीब, असहाय या पीड़ित की सहायता करते हैं, तो हम वास्तव में परमात्मा की पूजा करते हैं। इस अवसर पर बोलते हुए महंत स्वामी प्रेमानंद महाराज ने कहाभूखे को भोजन, प्यासे को जल, निराश को आशा और दुखी को सांत्वना देना ही सच्चा यज्ञ है। सनातन संस्कृति अनादि काल से संपूर्ण विश्व को ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का संदेश देती आई है। यह संस्कृति किसी एक समुदाय या सीमित विचारधारा तक सीमित नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करती है। हरिद्वार के मठों, मंदिरों, आश्रमों और अखाड़ों से गूँजने वाला शंखनाद केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि धर्म जागरण का प्रतीक है। वहाँ से प्रवाहित होने वाली आध्यात्मिक चेतना समस्त विश्व को यह संदेश देती है कि सत्य, अहिंसा, प्रेम और सेवा ही जीवन के वास्तविक आभूषण हैं। इस अवसर पर बोलते हुए बाबा हठ योगी महाराज ने कहासंत महापुरुषों के श्रीमुख से बहने वाली ज्ञान की गंगा अज्ञान रूपी अंधकार को दूर करती है और मानव को आत्मचिंतन की ओर प्रेरित करती है। यही ज्ञान व्यक्ति को यह समझाता है कि भौतिक संपत्ति क्षणभंगुर है, परंतु धर्म और सेवा से अर्जित पुण्य शाश्वत है। स्वामी चंद्रभूषणानंद महाराज नेकहा सनातन सर्वोपरि है क्योंकि यह जीवन को केवल सांसारिक सफलता तक सीमित नहीं रखता, बल्कि आत्मा की शुद्धि और परम सत्य की प्राप्ति का मार्ग दिखाता है। जो मनुष्य गाय माता की सेवा, संतों की वंदना, धर्म पालन, पुरुषार्थ और समाज सेवा को अपने जीवन का आधार बना लेता है, उसका जीवन वास्तव में सफल और सार्थक हो जाता है। ऐसा जीवन केवल स्वयं को नहीं, बल्कि पूरे समाज को प्रकाशमान करता है और आने वाली पीढ़ियों के लिए आदर्श बन जाता है। यही मनुष्य जीवन की सच्ची निधि है, यही उसका वास्तविक वैभव है और यही वह मार्ग है जो लोक और परलोक दोनों को उज्ज्वल बनाता है। इस अवसर पर कोतवाल कमल मुनि श्याम गिरी महाराज सहित हरिद्वार के अनेकों मठ मंदिर आश्रमों से आये संत महापुरुषों ने प्रसाद ग्रहण किया तथा अपने ज्ञान की अमृत वर्षा का प्रवाह किया।

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